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हिन्दू मुस्लिम आस्था का प्रतीक चाँद फ़कीर का ताजिया
फतेहपुर,,
लबे इमाम जुबा तक न आ सका पानी फिरा तमाम जहाँ पर बहा बहा पानी सही दान कर्बला की याद तरो ताज़ा हो जाती हैं .. मजहबे इस्लाम के लिए हजरत इमाम हुसैन ने अपने आप को कुर्बान कर दिया यजीदी लाहो लस्कर ने 6 माह के मासूम अली असगर को भी नहीं बक्सा जिस्म को तीरों से छन्नी कर दिया जिस गर्दन को बचपन में नाना जान ने चूम कर कहा था मेरे लख्ते जिगर तुम को कर्बला में एक दिन अपनी गर्दन कटानी हैं नाना जान से किया वादा हजरत इमाम हुसैन ने निभाया खुश्क होठ प्यास की शिददत शहीदो के लबो तक एक कतरा पानी की बूंद मयस्सर न हो सकी क्यू की यही थी ..मंजूरे खुदा वन्दी शहिदो के खून की खुसबू कर्बला की मिटटी से आज भी आलमे इस्लाम महसूस करते हैं .. यादे हुसैन मानाने वालो की दीवानगी का आलम ही निराला हैं .. हुसैन की दीवानगी में अपने अपने अंदाज़ में अपने को पिरो देते हैं ..
उत्तर प्रदेश फतेहपुर जिले में मुहर्रम का चाँद दिखते ही हुसैनी नारो की सदा कानो मे गूँजने लगती हैँ.जनपद की ताजियादारी जनपद से लेकर गैर जनपदो में मशहूर हैं चाँद फ़कीर का ताजिया जिसकी कुछ अलग खासियत हैँ, लोगो की मानी जाय तो चाँद फ़क़ीर सूफी संत कहा से आये कहा के थे. भलेही कोई नहीं जानता. मगर अपने हयाती दौर मे ताज़ीया दारी करते थे. उसी दौर मे चाँद फ़कीर बाबा ने ताजिये की जिम्मेदारी राइन बिरादरी को दें दिया. जब उनका विसाल हुया तो सुपुर्द खाख किया गया. तकिया चाँद शाह आज उनके नाम से ही जाना जाता हैँ, मस्जिद उसके बगल मे इमाम बाड़ा और मस्जिद के सामने आप की आराम गाह. चाँद शाह बाबा की रस्मो को तजिया की शक्ल मे राइन बिरादरी के लोग पूरा करते चले आ रहे हैँ, वक़्त बदलता गया तजिया का आकार बदलता गया मौजूदा समय मे तजिया का गलाफ जो की सोने चांदी कीमती नगो को लगाकर नाक्कासी की गयी जो बेसकीमती हैँ. यह ताजिया मुहर्रम की आठ तारीख़ को इमाम बाड़े से निकालकर बाहर रख दिया जाता हैँ. जायरीनो के लिए जहाँ हुज़ूम देखने को मिलता हैँ.आधी रात के बाद वापस इमाम बाड़े मे रख दिया जाता हैँ. मुहर्रम की 9 तारीख़ से अपने मुकाम से उठकर शहर के विभिन्न मार्गो मे घुमने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता मुहर्रम की ग्यारह तारीख को तजिया ठन्डे हो जाते हैँ. यह जनपद मुहर्रम के लिए मशहूर हैँ ज़नपद से लेकर गैर जनपद के सभी धर्मो के लोग जो चाँद फ़कीर बाबा पर आस्था रखते हैँ. उनको यहां देखा जा सकता हैँ….आलम लेकर लोग रस्म अदायगी के लिए इमाम बाड़े तकिया चाँद शाह आते हैँ. सेकड़ो वर्ष पुरानी परम्परा को आज भी राइन बिरादरी जीवित रखे हुये हैँ..
